Tuesday, 23 December 2014

मैं सह रही हूं सांवले होने की पीड़ा, जो भी मिला काली कह कर नकार गया

गर्व से कहो कि हम सांवले हैं


पूजा मेहरोत्रा


काली या सांवली होना अभी तक महिलाओं के लिए अभिशाप माना जाता था लेकिन हाल के वर्षों में बाजारवाद जिस कदर आम जीवन पर हावी हुआ है, इसने पुरुषों को भी अपने आगोश में ले लिया है। वे भी सोचने लगे हैं कि यदि आप सांवले हैं तो आप बिल्कुल स्मार्ट नहीं हैं, आप लड़कियां आपको देखेंगी भी नहीं। यही नहीं, यदि आप सांवले हैं और टैलेंटेड हैं तो भी नौकरी पाने की संभावनाएं गोरे लोगों की ही अधिक रहती है। यानी काले-सांवले और गोरे की लड़ाई में महिलाओं के साथ पुरुष और युवा भी शामिल हो गए हैं। अब लड़कों को भी अहसास होने लगा है कि किसी सांवली लड़की को काली कहकर नाक-भौं सिकोड़ने से उसके दिल पर क्या गुजरती होगी। वैसे, सांवले लड़के-लड़कियों को क्रीम लगाकर गोरा और स्मार्ट बनने का काम बॉलीवुड के जाने-माने सितारे शाहरुख खान, जॉन अब्राहम और शाहिद कपूर के साथ-साथ दीपिका पादुकोण, जेनेलिया डीसूजा, यामिनी गुप्ता कर रही हैं। गोरा बनाने का काम करने का दावा करने वाली कंपनियों ने देश के खिलाड़ियों को भी नहीं छोड़ा है। युवा लड़कियों के दिलों की धड़कन और युवाओं के रोल मॉडल कहे जाने वाले क्रिकेट के मैदान में प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ियों के चौके-छक्के छुड़ा देने वाले विराट कोहली भी विज्ञापन के द्वारा युवाओं को यह बताने से झिझकते नहीं हैं कि ‘गोरा लड़का ही स्मार्ट होता है।’ विज्ञापन में उन्हें गोरे और सांवले दोनों रूपों में दिखाया गया है।
दूसरी ओर, भारत से हजारों मील दूर न्यूजीलैंड में बैठे त्वचा विशेषज्ञ डॉ. शरद पॉल भारतीयों को सांवले होने पर गर्व करने की सलाह देते हुए कहते हैं कि ‘आप सांवले हैं और भारतीय भी है, तो आप अपने आपको भाग्यशाली समझिए क्योंकि सांवलों को त्वचा का कैंसर होने की संभावना कम होती है। इसके अलावा वे अधिक संवेदनशील और आकर्षक होते हैं। उनमें बीमारियों से लड़ने की क्षमता अधिक होती है। इसके साथ ही गहरे रंग वालों के शरीर में बहुत सारी ऐसी खूबियां पाई जाती हैं जो किसी भी माहौल में अपने आपको ढाल लेती हैं।’ डॉ. पॉल विश्व के जाने-माने चर्म कैंसर विशेषज्ञ हैं। उन्होंने गोरे-काले के भेदभाव में सांवलों को बेहतर बताते हुए एक किताब ‘स्किन : अ बायोग्राफी’ लिखी है, जिसमें उन्होंने इस बात का खुलासा किया है कि किस तरह से काली, गेहुंआ और सांवली त्वचा व्यक्ति को कई प्रकार की बीमारियों से लड़ने में मदद करती है। इस पुस्तक में उन्होंने यह भी बताया है कि क्यों होते हैं इंसान काले और गोरे? डॉ. पॉल भारत में चलाए जा रहे अभियान ‘डार्क इज ब्यूटीफुल’ के बहुत बड़े प्रशंसक हैं और कहते हैं कि काली त्वचा वाला इंसान सामाजिक और चिकित्सीय दृष्टि से भी अलग होता है।
वे बताते हैं कि इंसान का शरीर उसके पूर्वज बंदर (एप्स) से विकसित हुआ है। बंदर का विकास २८० लाख साल पहले हुआ था जबकि आदिमानव के शरीर का विकास अफ्रीका में एक लाख साल पहले ही हुआ। शुरू में उसकी त्वचा के रंग का निर्धारण विटामिन डी और फॉलिक एसिड के संतुलन की वजह से हुआ। इसमें भी हजारों सौ साल लगे। जैसे-जैसे बंदर का शरीर सीधा होता गया, उसका शरीर अधिक ताप ग्रहण करने लगा, जिसे संतुलित करने के लिए उसने अपने शरीर से बालों को छोड़ना शुरू कर दिया। इससे शरीर में फॉलिक एसिड की कमी होने लगी क्योंकि धूप से शरीर में फॉलिक एसिड की कमी होने लगती है, जिसे बचाने के लिए त्वचा अपना रंग काला कर लेती है। गहरे रंग की त्वचा में सूरज की रोशनी से लड़ने की अद्भुत क्षमता पाई जाती है। यही वजह है कि अफ्रीकी काले होते हैं।
फॉलिक एसिड प्रजनन क्षमता बढ़ाने के अलावा जन्मजात गड़बड़ियों से लड़ने में भी मददगार होता है, इसलिए एशिया और अफ्रीका में आबादी अधिक है और यहां के लोगों में जन्मजात बीमारियों का खतरा भी कम होता है। वहीं शरीर को मजबूत बनाने के लिए विटामिन डी की आवश्यकता होती है। पहले यह माना जाता था कि गोरी त्वचा हर मामले में बेहतरीन होती है लेकिन अधिकतर ठंडे पश्चिमी देशों के पर्यावरण में सूर्य की रोशनी कम मात्रा में पाई जाती है, जो शरीर के लिए हितकर नहीं होती। वैसे डॉ. पॉल यह बताने से भी नहीं हिचकिचाते हैं कि शरीर के रंग का बहुत कुछ संबंध खानपान से भी होता है।
दक्षिण एशियाई अपनी त्वचा के रंग को ध्यान में रखकर प्राय: धूप में जाने से बचते हैं इसलिए यहां की पूरी आबादी में विटामिन डी की भरपूर कमी पाई जाती है, जिससे उनमें हड्डी से जुड़ी कई बीमारियां पाई जाती हैं, यहां तक कि उन्हें प्रजनन में भी परेशानी होती है। डॉ. पॉल कुछ साल पहले की बात याद करते हुए बताते हैं कि ‘मेरे पास कोई ३० साल की महिला अपने पति के साथ आई। वह कई वर्षों से आइवीएफ तकनीक द्वारा बच्चे पैदा करने की कोशिश कर रही थी लेकिन सफल नहीं हो पा रही थी। वह थी तो गेंहुए रंग की लेकिन चेकअप के बाद पता चला कि उसमे विटामिन डी की बहुत ज्यादा कमी है। विटामिन डी भी महिला और पुरुष के प्रजनन क्षमता को कहीं-न-कहीं प्रभावित करता है। पुरुषों में जहां यह टेस्टोस्टेरोन की मात्रा में कमी लाता है, वहीं महिलाओं में कई तरह के हारमोन को बढ़ा देता है जिससे कई बीमारियां होती हैं। इससे नपुंसकता भी आ जाती है। बहरहाल, इलाज के बाद इस दंपती को आइवीएफ तकनीक से बच्चा पैदा हुआ।
इसलिए जो भी गहरे रंग को हेय और नीची नजरों से देखते हैं उन्हें पता होना चाहिए कि गहरा रंग सभी रंगों की त्वचा में अधिक संवेदनशील होता है और यह हमें कई प्रकार की बीमारियों से बचाती है, जिसमें त्वचा का कैंसर भी शामिल है। इसलिए गेहुंए और काले रंग पर गर्व कीजिए।