Friday, 12 December 2014

बिखरी ज़िंदगी समेट आगे बहुत आगे निकल गईं हैं ये “शीरोज”

बिखरी ज़िंदगी समेट आगे बहुत आगे निकल गईं हैं ये “शीरोज”
 तेज़ाब पीड़ित कई लड़कियां आज की “शिरोज” हैं। उन्होने घर की चारदीवारी लांघ दी है, घर से निकलने से पहले चेहरे को नकाब से ढकना छोड़ दिया है। तेज़ाब से पूरी तरह बह चुकी आँखों पर अब काला चश्मा भी नहीं लगाती हैं और शान से कहती हैं  हमे अपने इस चेहरे से प्यार है, क्यूँ छुपाएँ हम चेहरे को जब हमारी कोई गलती ही नहीं है।“ क्यूँ छुपे हम जमाने से?
पूजा मेहरोत्रा

जब शरीर पर गरम पानी की चंद बूंदे या गरम तेल के छींटे पड़ती हैं तो कुछ देर के लिए जलन हमे तिलमिला देती है और उस बूंद से शरीर पर पड़े छाले हमे डराते रहते हैं । हम उस दर्द को अहसास भी नहीं कर सकते जिनपर तेजाबी हमला होता है। तेज़ाब सिर्फ हमले के शिकार के जिस्म को नहीं झुलसाता  बल्कि पीड़ित की पूरी ज़िंदगी झुलस जाती है। झुलसे शरीर का दर्द कैसा होगा उसका अंदाज़ लगाना भी पूरे शरीर मे झुरझुरी पैदा कर देता है। तेज़ाब जैसे ही शरीर पर पड़ता है स्किन ऐसे पिघलती है जैसे पोलीथिन सिकुड़ती है या टायर जलता है। बूंद बूंद कर त्वचा गल कर निकल जाती है। आंखे तक बह जाती हैं। अगर तेज़ाब पीड़ित अपने चेहरे को नकाब से और आंखो को काले चश्मे से ढँक कर न चलें तो यकीन मानिए उन्हे देखने के लिए खास तरह कि हिम्मत की जरूरत पड़ती है। उस दर्द को महसूस भी नहीं किया जा सकता जिससे वे पीड़ित होती हैं। एक तरफा प्रेम मे पागल ने इसलिए एसिड फेंक दिया क्यूकी वो उसकी “न” सह नहीं पाया। भूख से बिलबिलाती बच्ची को देख माँ पति से कहती है दूध ला दो और बाप शराब पीकर आता है, बेटियों और पत्नी के लिए तेजाब लाता है ...उस नन्ही जान का क्या की उसकी माँ उसे जन्म देते ही चल बसी बाप सौतेली माँ लाया जो माँ न बन सकी सोई हुई बेटी पर तेज़ाब उड़ेल दिया। उस बहन का क्या जिसपर भाई को गर्व करना था कई कई बार बहन ने अपनी रक्षा के लिए उस भाई को राखी बंधी थी भाई ने उसे ही तेज़ाब मे डुबा दिया । लेकिन एक सवाल फिर से इस समाज से आखिर इन बच्चियों का कसूर क्या है ? कब तक तेज़ाब हथियार की तरह महिलाओं पर उपयोग किया जाता रहेगा? कानून भी इन बच्चियों कि मदद मे कमजोर नज़र आता है। हमला करने वाला बड़ी शान से अपनी ज़िंदगी मे खुश होता है और बछियाँ जिंदा लाश कि तरह पूरा जीवेन व्यतीत करने पर मजबूर होती हैं। समाज भी उन्हे ही दोषी मानता है। ताने भी उन्हे ही सहने पड़ते हैं। लंबी लड़ाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने तेजाब बिक्री पर पाबंदी लगाई लेकिन आज भी सरेराह तेजाब बिक्री हो रही है। हमला पीड़ित को तत्काल प्रभाव से सरकार को तीन लाख रूपय देने का आदेश है लेकिन कितनों को मिल पा रहा  है सरकार का समर्थन?