Monday, 23 January 2017

सो ना...., सो ना...नींद न आने की शिकायत है, करें उपाए


Top Tips for Great Sleep
मेट्रो की भागमभाग भरी जिंदगी में एक चीज हमसे तेजी से दूर भाग रही है और वह है नींद। कभी काम का प्रेशर, तो कभी दूसरों से आगे निकलने की टेंशन तो कभी सोशल मीडिया की लत... वजह कुछ भी हो लेकिन नींद ने हमसे मुंह मोड़ना शुरू कर दिया है। नींद को कैसे बनाएं अपना, एक्सपर्ट्स से बात करके पूरी जानकारी दे रही हैं पूजा मेहरोत्रा

मोहित रैना अक्सर अपनी गर्लफ्रेंड से देर रात तक वट्सऐप पर चैट करते रहते हैं। सोते-सोते रात में करीब 1 बज जाते हैं। इसके बाद नींद मोहित की आंखों से दूर भागने लगती है और वह घंटों बिस्तर पर करवटें बदलते रहते हैं। मोहिनी व्यास मीडिया में काम करती हैं। देर रात को घर लौटती हैं। अक्सर तब तक हज्बैंड और बेटी सो चुके होते हैं। मोहिनी दिन भर की बात किसी से शेयर नहीं कर पातीं और ऐसे में मन पर एक बोझ-सा रहता है। विचारों के भंवर में फंसी मोहिनी को नींद के लिए अक्सर दवा का सहारा लेना पड़ता है।
ये दो उदाहरण भर हैं। ऐसे मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। खास बात यह है कि यह समस्या शहरों के युवाओं को ज्यादा जकड़ रही है। एक अनुमान के मुताबिक दुनिया में हर पांचवें शख्स की नींद पूरी नहीं हो रही।
बढ़ रही है बीमारी
तनाव, काम का प्रेशर और मस्ती में डूबे युवा अपनी नींद वीकएंड पर पूरी करने की बात करते हैं। लेकिन वीकएंड पर पार्टी और मिलने-जुलने में नींद एक हफ्ते के लिए टल जाती है। धीरे-धीरे नींद पूरी होने में हफ्ता और कभी-कभी महीना भी लग जाता है। रात में ठीक से नींद न आने की शिकायत अक्सर घर के बड़े-बुजुर्ग किया करते हैं लेकिन अब महानगरों में यह शिकायत युवाओं से होती हुई बच्चों तक पहुंच गई है। आज लगभग 90 फीसदी बच्चों के हाथ में मोबाइल है। फोन में इंटरनेट है। सोने के कमरे में ही टीवी है। बच्चे देर रात तक सोशल मीडिया पर जूझते हैं और देर से सोते हैं। सुबह 6 बजे स्कूल के लिए अधूरी नींद में ही तैयार होते हैं और स्कूल चले जाते हैं। यह प्रक्रिया लगातार चलती रही है। आंकड़े बताते हैं कि महानगरों और शहरों में रहने वाले करीब 65-70 फीसदी लोग अपनी पूरी नींद नहीं ले पा रहे।
महानगरों और शहरों में लोग औसतन 1-2 घंटे कम सो रहे हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि बदलते लाइफस्टाइल का सीधा असर बच्चों, युवाओं और खासकर महिलाओं पर पड़ रहा है। शहरी युवा, बच्चों और कामकाजी महिलाओं की नींद पूरी नहीं हो पा रही। फरवरी 2016 में यूएस सेंटर फॉर डिज़ीज कंट्रोल ऐंड प्रिवेंशन ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि एक-तिहाई अमेरिकी अडल्ट नियमित रूप से नींद की समस्या से पीड़ित हैं।
क्यों जरूरी है नींद
नींद हमारे शरीर और दिमाग को सेहतमंद और चुस्त रखने का जरिया है। जिस तरह मशीन लंबे समय तक चलते-चलते अपना संतुलन खो देती है, ठीक उसी तरह हमारा शरीर भी एक समय के बाद आराम चाहता है। दिनभर में हुई थकान को दूर कर तन-मन को तरोताजा करती है नींद। इससे मन और दिमाग शांत रहता है। अगर शरीर को सही से आराम न मिले तो शारीरिक और मानसिक सिस्टम पर असर पड़ने लगता है। इम्यून और नर्वस सिस्टम को नॉर्मल रखने, बीमारियों से लड़ने और सोचने-समझने की क्षमता को बनाए रखने के लिए नींद जरूरी है। आंकड़े बताते हैं कि देश में होने वाले कुल सड़क हादसों से 33 फीसदी सिर्फ नींद की कमी के कारण होते हैं।
नींद न आने से होने वाली समस्याएं
- सिर और शरीर में दर्द होना
- मन चिड़चिड़ा रहना
- कंसंट्रेशन कम होना
- बात-बात पर गुस्सा आना
- काम में मन नहीं लगना
- काम की क्षमता कम होना
- थकान और उनिंदा रहना
- बच्चों का आईक्यू लेवल कम होना
- मोटापा बढ़ना
- कब्ज रहना
- ब्लड प्रेशर, डायबीटीज, हार्ट प्रॉब्लम, ब्रेन हैमरेज जैसी बीमारियां की भी आशंका बढ़ जाती है।
जाने नींद का साइकल
बिस्तर पर लेटने के 15 से 30 मिनट के अंदर नींद आ जानी चाहिए। नींद आने में इससे ज्यादा वक्त लगता है तो परेशानी की बात है। नींद का एक साइकल होता है। एक साइकल में रैम (आरईएम यानी रैपिड आई मूवमेंट) और नॉन-रैम (एनआरईएम यानी नॉन-रैपिड आई मूवमेंट) दोनों होते हैं। रैम हल्की नींद होती है, जिसमें हमारी आंख की पुतलियां चलती रहती हैं और नॉन-रैम गहरी नींद होती है, जिसमें पुतलियों का मूवमेंट बंद हो जाता है और शरीर पूरी तरह ढीला पड़ जाता है। नींद का करीब 20 फीसदी हिस्सा रैम और बाकी 80 फीसदी हिस्सा नॉन-रैम होता है। बच्चों में करीब 50 फीसदी तक रैम स्लीप होती है। दरअसल रैम और नॉन-रैम, दोनों अहम हैं। रैम नींद सीखने और अनुभव करने के लिए अच्छी होती है। दिन में जो भी बीतता है, उसे रैम के दौरान दिमाग रात में कोऑर्डिनेट करता है। नॉन-रैम नींद शरीर को रिपेयर और रिलैक्स करने का काम करती है। जो बच्चे ठीक से सोते नहीं है, उनकी मेमरी कमजोर हो जाती है और वे सीख भी कम पाते हैं। जिन लोगों की नींद कच्ची (हल्की) होती है, उनकी आंख जरा-सी आहट से खुल जाती है। ऐसे लोगों की नींद घंटे-दो घंटे में टूटती रहती है। तीन-चार घंटे से पहले आंख नहीं खुले, तभी डीप स्लीप होगी।
कितनी नींद जरूरी?
हर किसी की नींद की जरूरत अलग होती है। कोई कम सोकर भी फ्रेश रहता है तो किसी को ज्यादा सोने की जरूरत पड़ती है। कितनी देर सोएं, इससे ज्यादा जरूरी है कि जितना भी सोएं, अच्छी और गहरी नींद सोएं। सोते हुए दो बार से ज्यादा नींद खुले तो उससे नींद डिस्टर्ब होती है। 10 घंटे की खराब नींद से 5-6 घंटे की अच्छी और गहरी नींद बेहतर है।
नवजातः 14-17 घंटे
6 महीने से 2 साल तक: 13-15 घंटे
2 से 4 साल तक: 12-14 घंटे
4 से 7 साल तक: 11-14 घंटे
7 से 15 साल तक: 11-13 घंटे
15 से 18 साल तक : 9-10 घंटे
18 से 35 साल तक : 8-10 घंटे
35 से 50 साल तक: 8-9 घंटे
50 साल से ज्यादा: 7-8 घंटे
नोट: किसी अडल्ट के लिए बहुत ज्यादा सोना (10 घंटे से ज्यादा) भी सेहत के लिए सही नहीं है। हालांकि कभी-कभार ऐसा हो तो चलता है।
कौन-सा वक्त बेहतर
सोने के लिए सबसे अच्छा वक्त है, रात 10 बजे से सुबह 6 बजे का। इसमें एकाध घंटा आगे-पीछे भी ठीक है। लेकिन और देर से सोते हैं तो शरीर को फ्रेश होने के लिए और लंबी नींद की जरूरत होती है। कई लोग रात भर काम करते हैं और दिन में सोते हैं, जोकि सेहत के लिहाज से ठीक नहीं है। दिन में जागना और रात में सोना ही सही है। दरअसल, हमारा शरीर सूरज के मुताबिक काम करता है, इसलिए अगर कोई रात में जागता है और दिन में सोता है तो उसकी बॉडी क्लॉक बदल जाती है। इसे ही रुटीन बना लिया जाए तो ज्यादा दिक्कत नहीं होगी लेकिन कभी दिन में सोते हैं और कभी रात में तो बॉडी एडजस्ट नहीं कर पाती। वैसे, दिन में 30 मिनट से 1 घंटे की झपकी (पावर नैप) ले सकते हैं लेकिन इसे आदत न बनाएं। दिन में इससे ज्यादा सोएंगे तो रात में अच्छी नींद नहीं आएगी।
आखिर क्यों नहीं आती नींद
नींद न आने की समस्या किसी भी उम्र में हो सकता है। हालांकि इससे महिलाएं और बुजुर्ग ज्यादा प्रभावित होते हैं। इसकी कई वजहें हो सकती हैं लेकिन सबसे बड़ा कारण है तनाव। इसके अलावा डिप्रेशन, एंजाइटी, ज्यादा शराब पीना या दूसरे नशे करने के अलावा कुछ पार्किंसंस, हाइपरटेंशन और डिप्रेशन की दवाएं भी नींद को डिस्टर्ब करती हैं। भारतीयों को नींद संबंधी दिक्कतें इसलिए भी होती हैं, क्योंकि हमारा रेस्पिरेटरी ट्रैक दूसरे देशों के लोगों के मुकाबले संकरा होता है। इसके अलावा रेस्टलेस लेग सिंड्रोम भी नींद न आने की वजह है। इसमें मरीज की टांगें लगातार हिलती रहती है जिससे नींद पर असर पड़ता है। स्नोरिंग यानी खर्राटे लेना और स्लीप एप्निया भी नींद में गड़बड़ी की वजह बनते हैं।
स्नोरिंग और स्लीप एप्निया का फर्कखर्राटे मारना बेहद आम समस्या है। इसमें काग (युविला) पीछे गिर जाता है और सांस की नली को ब्लॉक कर लेता है। इससे सांस लेने में दिक्कत आती है और मुंह से सांस लेने पर आवाज आती है। लेकिन अगर स्नोरिंग के साथ मरीज को स्लीप एप्निया भी है तो खतरा ज्यादा होता है। एप्निया में सोते वक्त सांस कुछ सेकंड के लिए रुक जाती है। ऐसे में रुकावट के बाद तीखी आवाज के साथ सांस आती है, जो उसके पास सो रहे व्यक्ति को डरा देती है। इससे कई बार सोते हुए मरीज की मौत भी हो जाती है। दरअसल, शरीर में ऑक्सिजन कम होते ही दिल को ऑक्सिजन के लिए ज्यादा प्रेशर लगाना पड़ता है। रात में सोते वक्त जब समस्या बढ़ जाती है, तो हार्ट अटैक हो जाता है। स्नोरिंग और एप्निया की बड़ी वजह मोटापा है। डॉक्टरों का मानना है कि पुरुषों की गर्दन की माप 17 इंच और महिलाओं की 16 इंच से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। इससे ज्यादा होने पर एप्निया का खतरा बढ़ जाता है। एप्निया की आशंका उन लोगों में दोगुनी हो जाती है, जिन्हें रात में अक्सर नाक बंद होने की समस्या रहती है। उम्र बढ़ने के साथ इसका खतरा बढ़ जाता है। पुरुषों में एप्निया का खतरा महिलाओं के मुकाबले तीन गुना ज्यादा होता है।
क्या है इलाज: स्नोरिंग रोकने के लिए एंटी-स्नोरिंग डिवाइस (CPAP या MAD) का इस्तेमाल किया जाता है। इनका खर्च 30 से 45 हजार तक आता है। हालांकि बिना डॉक्टर की सलाह के किसी डिवाइस का इस्तेमाल न करें। इन डिवाइस से एप्निया और खर्राटों को खत्म नहीं किया जा सकता, सिर्फ रोका जा सकता है ताकि इनसे होने वाली बीमारियों से बचा जा सके। स्नोरिंग या एप्निया को रोकने के लिए सर्जरी ही परमानेंट हल है।

क्या है नींद न आने का इलाज
नींद न आने की सही वजह जानने के लिए डॉक्टर से मिलें। इसके लिए जनरल फिजिशन के अलावा बड़े अस्पतालों में स्लीप एक्सपर्ट भी होते हैं। डॉक्टर मरीज को अस्पताल की स्लीप लैब में सुलाते हैं। इसमें सोते वक्त शख्स को मशीनों की देखरेख में रखा जाता है। आजकल यह टेस्ट घर पर भी होता है। सोने के दौरान मरीज कितनी बार उठता है, दिमाग और आंख की गतिविधियां, ब्लड में ऑक्सिजन और कार्बन-डाई-ऑक्साइड का लेवल, हार्ट रेट आदि पर गौर किया जाता है। इस स्टडी के बाद ही इलाज शुरु किया जाता है। इस टेस्ट का खर्च 6-7 हजार रुपये तक होता है। वैसे, फिटनेस बैंड से भी नींद का आइडिया मिल जाता है।
आयुर्वेद में नींद का इलाज
आयुर्वेद में रेग्युलर रुटीन, रोजाना सुबह एक्सरसाइज, पौष्टिक खाने की सलाह दी जाती है। इसके साथ आयर्वेद में यह भी कहा जाता है कि लेफ्ट करवट सोने से पाचन शक्ति मजबूत होती है। सोने से पहले गरम दूध पीने से शरीर का तापमान ठीक रहता है और नींद अच्छी आती है। सूरज छिपने से पहले या सोने से कम-से-कम 2-3 घंटे पहले खाना खा लेना चाहिए ताकि खाना आसानी से पच जाए और नींद अच्छी आए। अगर किसी को नींद न आने की समस्या है तो तनाव कम करने के लिए मसाज थेरेपी दी जाती है। मसाज के तेल में कई तरह की जड़ी बूटियां मिलाई जाती हैं और गरम तेल से मसाज की जाती है जिससे शरीर का तापमान और तनाव कम हो। आप खुद भी किसी तेल को हल्का गुनगुना कर मसाज कर सकते हैं। इससे सोने में मदद मिलती है। इन सब इलाज से राहत न मिले तो बीमारी के अनुसार दवाएं भी दी जाती हैं जो तनाव को कम करने में मदद करती हैं, जैसे कि स्वप्न सुधा और अश्वगंधा का चूर्ण आदि। डॉक्टर की सलाह के बिना कोई दवा न लें।
योग भी है मददगार
नियमित योग करने से अच्छी नींद में मदद मिलती है खासकर वज्रासन और शवासन के अलावा अनुलोम-विलोम प्राणायाम और ओम का उच्चारण करना भी नींद में मददगार है।
वज्रासन: दोनों घुटने को मोड़ कर पीठ को सीधा रख कर लंबी-लंबी सांस लें। खाना खाने के बाद इसे करने से पाचन अच्छा होता है। ब्लड प्रेशर भी कंट्रोल में रहता है। 5-10 मिनट करें। घुटने में दर्द वाले इस आसन को न करें।
ओम का उच्चारण: पद्मासन या सुखासन में ध्यान मुद्रा में बैठ जाएं। माथे के बीचोंबीच जहां महिलाएं बिंदी लगाती हैं, वहां ध्यान केंद्रित करें और फिर ओम का लंबा उच्चारण करें। 5-10 मिनट करें। इससे तनाव कम होता है।
अनुलोम-विलोम: सुखासन में बैठकर, पीठ सीधी रखकर गहरी लंबी सांस लेते हुए सीधे हाथ के अंगूठे से नाक की राइट साइड को दबाते हुए सांस लें और लेफ्ट साइड से छोड़ें। फिर लेफ्ट ओर से करें। 5 मिनट कर लें।
शवासन: इसे बिस्तर पर ही कर सकते हैं। लेट कर पूरे शरीर को ढीला छोड़ दें। आंख बंद कर उन अंगों पर ध्यान लगाएं जहां तनाव या दर्द है और सोचें कि दर्द ठीक हो रहा है। तनाव जा रहा है। 5-10 मिनट करें। इससे नींद अच्छी आती है।
अच्छी नींद के लिए क्या करें
- फिक्स्ड रुटीन के अनुसार सोएं। इससे तय वक्त पर नींद आएगी और टूटेगी।
- बेडरूम साफ-सुथरा हो और उसमें घुप्प अंधेरा हो। जरूरत लगे तो नाइट लैंप की हल्की रोशनी रख सकते हैं।
- किसी भी शख्स के लिए सूरज की रोशनी और अंधेरा, दोनों देखना जरूरी है। स्लीप हॉर्मोन मेलाटॉनिन तभी निकलता है, जब सूरज की रोशनी में भी जाएं। यह स्लीप साइकल को मेंटेन करता है।
- रोजाना सुबह एक्सरसाइज करें। इससे शरीर थकता है और रात में अच्छी नींद आती है।
- रात में कुछ दिलचस्प पढ़ने से बचना चाहिए। बोरिंग-सी किताब या फिर संडे नवभारत टाइम्स (हा-हा) पढ़ें। इससे नींद जल्दी आएगी।
- सोने से पहले गुनगुना दूध पिएं। इससे भी अच्छी नींद आती है।
क्या न करें- बेडरूम में बाहर की आवाजें और तेज रोशनी न आएं।
- तेज म्यूजिक सुनने और फास्ट डांस करने से बचें।
- देर रात तक कंप्यूटर गेम्स न खेलें, न ही टीवी देखें।
- सोने से पहले तेज एक्सरसाइज न करें। वर्कआउट के फौरन बाद खून में स्ट्रेस हॉर्मोन बढ़ जाता है।
- सोने से करीब दो घंटा पहले खाना खा लें।
- सोने से पहले चाय, कॉफी और मसालेदार खाना न खाएं। इनसे नींद की क्वॉलिटी गिर सकती है।
- सोने से पहले खाने से बचें क्योंकि इससे शुगर लेवल बढ़ जाता है। भूख लगे तो फल खाएं या गुनगुना दूध पिएं।
- अगर रात में बार-बार टॉयलेट जाना पड़ता है तो सोने से डेढ़ घंटे पहले कुछ न पिएं।
- ज्यादा शराब पीनेवालों को भी बाद में नींद आने में परेशानी हो सकती है। निकोटिन का सेवन न करें।
- जरूरत नहीं है तो दिन में न सोएं। कम-से-कम लंबी नींद न लें।

जब नींद न आए...
- जबरन बिस्तर पर लेटकर जबरन सोने की कोशिश न करें। उठकर कुछ काम करें। पढ़ें, टीवी देखें या हल्की एक्सरसाइज भी कर सकते हैं। मेडिटेशन करें। इससे मन रिलैक्स होता है।
कुछ अहम सवाल और जवाब
1. कैसा हो गद्दा और तकिया?
सोने के लिए सख्त बेड होना चाहिए। जमीन पर सोने से बचना चाहिए। मेट्रेस का खास ध्यान रखें। कॉयर (नारियल का भूसा) का मेट्रेस बेहतर होता है। स्पॉन्ज से बचना चाहिए। तकिए की मोटाई 1-2 इंच से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। इसे ऐसे लगाएं कि गर्दन को सपोर्ट मिले।
2. खाने के बाद नींद क्यों आती है?
खाना खाने के बाद ब्लड सर्कुलेशन पेट की तरफ ज्यादा हो जाता है और दिमाग की तरफ कम। इससे भी सुस्ती महसूस होती है। ब्रेन का वजन शरीर का सिर्फ 2 फीसदी होता है, लेकिन उसे 20 फीसदी ब्लड सप्लाई की जरूरत महसूस होती है। दिमाग को ब्लड सप्लाई कम होने पर नींद आने लगती है।
3. पढ़ते वक्त नींद क्यों आती है?
कोई भी ऐसा काम जिसमें दिमाग बहुत रिलैक्स या बोरिंग महसूस करे, इसमें नींद आती है। शरीर में सिरोटोनिन (खुशी और जोश महसूस कराने वाला हॉर्मोन) का लेवल ज्यादा हो तो अच्छा महसूस होता है और आलस महसूस नहीं होता। खेलते हुए शरीर में सिरोटोनिन हॉर्मोन निकलता है, जिससे तरोताजा महसूस होता है।
4. क्लासिकल म्यूजिक सुनना क्या नींद लाने में मदद करता है?
क्लासिकल म्यूजिक से मन रिलैक्स होता है और दिमाग से ऐसी वेव्स निकलती हैं जो सोने में मददगार होती हैं।
5. क्या पॉश्चर से भी नींद पर फर्क पड़ता है?
डॉक्टरों का मानना है किसी भी आरामदायक पॉश्चर में सोना बेहतर है। हालांकि स्टडी कहती हैं कि अगर आप लेफ्ट करवट सोते हैं तो नींद बेहतर आती है।
मोबाइल ऐप्स
Sleep Better
इस ऐप को मोबाइल में डाउनलोड करें और रात में सोते वक्त अपने तकिया के नीचे रख दें। अगर आप इसमें अलार्म सेट कर देंगे तो ऐप आपको उठा भी देगा लेकिन तभी, जब आपका शरीर उसके लिए बेस्ट महसूस करे और नींद करीब-करीब खत्म हो चुकी हो। यह ऐप यह जानकारी भी देता है कि किस तरह एक्सरसाइज, कैफीन, अल्कोहल या तनाव आपकी नींद पर असर डालता है। यहां तक कि यह आपके सपनों की व्याख्या भी करता है।
प्लैटफॉर्म: एंड्रॉयड, ios
कीमत: फ्री
Relax Melodies
ज्यादातर लोगों को एक बार नींद आ जाए तो सोने में दिक्कत नहीं होती लेकिन नींद आना ही असली समस्या होती है। यह साइट कई तरह के साउंड मुहैया कराती है, जिन्हें सुनकर आप गहरी नींद में जा सकते हैं। आप अपनी पसंद का कोई एक साउंड चुन सकते हैं या साउंड का कॉम्बो भी तैयार कर सकते हैं। फिर भी सही से नींद न आए तो आप मेडिटेशन ट्रैक भी लगा सकते हैं।
प्लैटफॉर्म: एंड्रॉयड, ios
कीमत: फ्री
वेबसाइट
sleepio.com: इस साइट के जरिए आप जान सकते हैं कि अपनी नींद सही है या नहीं। आप यहां नींद से जुड़े कई लेख भी पढ़ सकते हैं। यही नहीं, यहां से आपको अपनी नींद की समस्या का हल पाने के लिए प्रफेशनल की मदद भी मिल सकती है।
sleepeducation.org: नींद से जुड़ी कोई भी जानकारी चाहिए तो यह वेबसाइट आपकी मदद करेगी। यहां से आप एक्सपर्ट की राय भी ले सकते हैं, वह भी पूरी तरह फ्री।
एक्सपर्ट्स पैनल
डॉ. के. के. दीपक, प्रफेसर, मेडिकल एजुकेशन
डॉ. हृदयानंद मलिक, प्रफेसर, स्लीप मेडिसन
डॉ. के. पी. कोचर, प्रफेसर, मेडिकल ह्यूमैनेटीज़
डॉ. राजेश सागर, प्रफेसर, सायकायट्री, एम्स
डॉ. सरवन, कैराली आयुर्वेदिक सेंटर
सुनील सिंह, योग गुरु