Tuesday, 4 October 2016

एक कोशिश सपनों में रंग भरने की...कास्प दिल्ली की योजना...

मैं जब भी उनकी आंखों में देखती हूं मुझे अनगिनत सपने तैरते नजर आते हैं. उनके टैलेंट के आगे अंग्रेजी स्कूल और कॉन्वेंट स्कूलों से मिले बड़े बड़े सर्टीफिकेट बेमानी से नज़र आते हैं.ये वो बचपन है जो सपने तो अनगिनत देख रहा है लेकिन उसे पूरा कैसे करें उसका उसे कोई ठौर नहीं मिल रहा है...

एक की आंखें खुद को टीचर बनता देखना चाहती हैं और दूसरी की आंखे डॉक्टर..
कुछ कुछ आंखों में सपना डांसर बनने का भी है और कोई तो वो दीदी जैसा बनना चाहती है पत्रकार..
उन सपनों को पूरा करने की पहल में मैंने अपने सपने को दरकिनार कर दिया है...इन बच्चों में इतना दम है कि एक बार बताई बात को हूबहू आपके सामने पेश करने के जुगत में जुट जाते हैं...
इन सपनों के बीच और भी सपने पल रहे हैं...अच्छे जीवन का सपना...साफ सड़क और सुरक्षित जीवन का सपना...जहां पीने का पानी साफ हो..जहां नालियां बजबजाती न हों..
जहां घर से बाहर पूरा कपड़ा पहन कर निकलने के बाद भी आंखें तन के अंदर तक घुस जाने को बेताब न दिखें...
कोमल मन ये सवाल न करे...दीदी हम जब भी निकलते हैं ये सारे अपना खास अंग क्यों पकड़ लेते हैं?
अंग अपना वो पकड़ते हैं और चरित्र हमारा क्यों खराब हो जाता है?
दीदी कल मुझे एक गंदे से लड़के ने कुछ गलत कहा ...आपने कहा था मां को बताना....दीदी मैंने मां को बताया था....मां ने मुझे स्कूल जाने को कुछ दिन के लिए मना कर दिया है...और डांटा भी कि मैंनें आंखों में काजल लगाया था ...इसलिए मुझे उसने ऐसा कहा...

इन बिखरते सपनों और सवालों के बीच झूलती मैं...लड़कियों को देख कर अपना अंग वो टटोले और खराब बदचलन लड़कियां क्यों ?
सपने जो जन्म लेते ही मरने के लिए हैं...झुग्गी झोपड़ी के सपने...जो छूना आसमान चाहते हैं लेकिन कई कुचल कर मार दिए जाते हैं...लेकिन इनमें से कुछ हिम्मत करते हैं...और आसमान में सुराख कर देते हैं....अनकही...क्या जवाब दूं?
हर सपने में एक सपना नजर आता है..पिछले दिनों मुझे बच्चों के साथ खासकर बच्चियों के साथ कुछ समय बिताने का मौका मिला..मैं हर एक बच्ची को नाम से जानती हूं..हर एक बच्ची अपने आप में एक कहानी है..हर एक सपने के अंदर एक सपना हर दिन पनप रहा है और टूट रहा है..वो भी कर गुज़रनाा चाहती हैं जिंदगी में लेेकिन कहां? कुछ समय और कुछ जगह..एक बच्ची गजब थिरकती है...पूछा कहां सीखने जाती हो बोली दीदी कल वीडियो देखा था पड़ोस की आंटी के घर में...कटरीना कैफ की थिरकन कई गुना पीछे थी उस दस साल केे सपने के आगे...फिर पता चला कि एक बार   स्कूल में सेल्फ डिफेंस वाले आए थे..कुछ टिप्स दे गईं थी दीदी..मौका न तो प्रैक्टिस का मिला न ही हि्म्मत ही मिली लेकिन आज आपके सामने वो एक बार करना है...और बात करते करते पटक दिया उसने अपने से बड़ी भारी भरकम को...पुलिस में जाना है और ये जो हम लड़कियों को खराब कहते हैं न उन्हें बताना है कि हम नहीं वो हैं खराब...
सपना क्यों न पनपे जब घर में जीताा जागता सपना चल रहा हो...पढ़ने कीी शौकीन...क्यों क्या अच्छा लगता है पढ़ने में..
दीदी सबकुछ ...लेकिन इससे काम नहीं चलेगा... दीदी मैं चार भई बहन हूं...हम सभी पढ़ते हैं..
मां को लगता था कि हम उन्हें झूठ बोलते हैं एक दिन पता चला मां भी पढ़ती हैं... मेरी मां बारहवीं की परीक्षा देंगी...हर बार अच्छे अंक आएं हैं मां के... पहले हम पढ़ने के लिए पढ़ते थे लेकिन अब हमें सिर्फ पढना नहीं बल्कि कुछ करना भी है...मैं या तो डॉक्टर बनूंगी या फिर पुलिस

पिछले दिनो मैं दिल्ली की एक झुग्गी बस्ती इलाकाा मदनपुर खादर के बच्चों के सपनों से मिली...ये बस बानगी है...ऐसे कई सपने अनगिनत आंखों में तैर रहे हैं....कास्प की मंजू मैम कुछ सपनों में रंग भर चुकीं हैं लेकिन और कितने सपनों के रंग चटक हो पाते हैं....देखना होगा...एक कोशिश है...सपनों में रंग भरने की...