Friday, 19 December 2014

बेरोजगार हिंदी पत्रकारों की बढती कतार, मनमानी करते मीडिया हाउस

नौकरी के मेले में मेरा भी एक दिन। चौंक गई हूं मीडिया के हालात देख कर। दो पोस्‍ट और सैंकड़ो की संख्‍या में हम। राज्‍यसभा टीवी में आज प्रोडयूसर के दो रिक्तियों के लिए इंटरव्‍यू था। दोपहर दो बजे सभी को रिपोर्ट कर देना था लेकिन पत्रकार सुबह 10 बजे से कतार में थे।

जॉब मेले के बारे में आप लोगों में से कई लोगों ने कई बार सुना होगा। बेहतरीन कर्मचारी की तलाश में दिग्‍गज कंपनियां ऐसे ही जॉब मेले आयोजित करवाती हैं फिर इसमें शिरकत करती हैं।  मेलों में कम दामों पर थोक के भाव में उन्‍हें बेहतरीन कर्मचारी मिल भी जाते हैं। अक्‍सर बेरोजगार बहुतायत में पहुंचते हैं। लेकिन कभी कभी कुछ नए और अलग की तलाश वाले किसी कंपनी में कार्यरत भी रुख कर लेते हैं। चूंकि वे कामकाजी हैं और उनकी नौकरी बरकरार है तो नामी कंपनियां भी उन्‍हें ही ऑफर थमा कर चली जाती हैं। और बेरोजगार बेचारा अपने भाग्‍य को कोसता हुआ एक बार फिर थके पांव से घर की ओर लौट लेता है। कुछ ऐसे ही हालात इन दिनों हिंदी मीडिया में कार्यरत पत्रकारों के हैं। कुकुरमुत्‍ते की तरह चिटफंडिया कंपनियां बाजार में मीडिया हाउस लाती हैं और बरसाती मेढक की तरह गायब भी हो जाती हैं। पिछले कुछ सालों में मीडिया खासकर हिंदी मीडिया गर्त की ओर ढकेला जा रहा है। इसे ढकेलने वाले कोई और नहीं इसके कर्ता धर्ता हैं। अच्‍छा ये बातें फिर कभी । यहां बात हो रही है बेरोजगार होते पत्रकारों की। बेरोजगार पत्रकारों का आलम यह है कि जिसे जहां थोडी भी उम्‍मीद नजर आ रही है वह बिना यह जाने की वहां उसकी प्रतिभा को पहचान मिलेगी या नहीं बस वो वहां पहुंचने की जददोजहद में लगा हुआ है। चाहें इसके लिए उसे 2000 किलोमीटर की दूरी ही क्‍यों न तय करनी पड़ रही हो। 19 दिसंबर को यही नजारा देखने को मिला राज्‍यसभा टेलीविजन के वॉक इन इंटरव्‍यू में। वैसे ये इंटरव्‍यू तो कई पोस्‍ट के लिए और कई दिनों से चल रहे थे, शायद हर दिन का यही नजारा रहा होगा जैसा शुक्रवार को देखने को मिला। चूंकि इस इंटरव्‍यू का हिस्‍सा मैं और मेरे कई साथी थे तो हमने इस बारीकी को गहराई से समझने की कोशिश की। पिछले दिनों कुछ मीडिया हाउस बंद होने की वजह से हिंदी पत्रकार बहुतायत में बेरोजगार हुए हैं तो उनके लिए राज्‍य सभा की ये वैकेंसी उम्‍मीद की किरन बनी हुई थी। जिन लोगों को दोपहर दो बजे रिपोर्ट करने के लिए कहा गया था वे सुबह दस बजेसे ही कतार में खड़े थे। लेकिन राज्‍यसभा टीवी की वैकेंसी उस समय मजाक साबित हुई जब प्रिंट मीडिया में अच्‍छा तर्जुबा रखने वालों को बाहर का रास्‍ता बेदर्दी से दिखा दिया गया। क्‍योंकि उन्‍हें सिर्फ टीवी के पत्रकार ही चाहिए थे। वैसे यह बात विज्ञापन में साफ साफ लिखी गई थी लेकिन बेरोजगारों की मन:स्थिति समझिए हर कोई जानता है प्रतियोगिता के और न्‍यू मीडिया के इस युग में टेक्‍नॉलॉजी समझना हर किसी के बायं हाथ का खेल है और उसमें समय भी नहीं लगता है। यही सोच लिए प्रिंट मीडिया के बेरोजगार और बेहतरी की तलाश में कई पत्रकार कतार में घंटो अपना समय बर्बाद करते रहे लेकिन जब उन्‍हें बिना इंटरव्‍यू दिए वापस भेजा गया तो यकीन मानिए बेरोजगार होने से ज्‍यादा बेइज्‍जती महसूस हो रही थी। कई लोग तो मुंबई, कोलकाता, चेन्‍नै, लखनऊ, मथुरा और न जाने कहां कहां से यहां एक अदद नौकरी की तलाश में यहां पहुंचे थे।
राज्‍यसभा टीवी का यह नजारा किसी मेले जैसा ही था। महज दो दो पोस्‍ट की रिक्तियां निकाली गईं थीं और हजारों की संख्‍या में लोग पहुंचे थे। व्‍यवस्‍था बनाए रखना मुश्किल हो रहा था। हर किसी को मौका मिले इसलिए टोकन नंबर, वेरीफिकेशन और कतार लगाए जाने तक की व्‍यवस्‍था की गई थी लेकिन सब बेकार। इंटरव्‍यू के लिए महज चार से छह साल के तर्जुबे वाले लोग ही बुलाए गए थे लेकिन वहां कतार में जो लोग खड़े थे उनका एक्‍सपीरिएंस चौंकाने वाला था। कतार में खड़े हर किसी का तर्जुबा 15-16 साल से कम तो था ही नहीं। यह छोडि़ए हर दूसरा तीसरे से आंख बचा रहा था। शिष्‍य गुरू के आगे नतमस्‍तक हो या उसे कंपटीटर समझे वहां यह बड़ी दुविधा दिखाई दे रही थी। जाना पहचाना चेहरा देख या तो लोग एक दूसरे से नजरें छुपा रहे थे या फिर चरणस्‍पर्श करते देखे जा रहे थे। उस भीड़ में इक्‍के दुक्‍के लोग ही होंगे जिन्‍हें जुम्‍मे जुम्‍मे दो चार साल हुए होंगे मीडिया में। लेकिन एक बात समझने वाली है कि क्‍या सचमुच ऐसा मेला लगाने की जरूरत थी या ऐसे विज्ञापन की आवश्‍यकता थी। दो रिक्तियां तो हर दिन आने वाले बायोडाटा से भी भरी जा सकती थीं। चैनल में सैंकड़ो लोग काम करते हैं अंदर के लोगों को ही कह देते कि भाई अपने लोगों को इंटरव्‍यू के लिए बुला लो।

 भारत जैसे महान देश में जहां महंगाई और बेरोजगारी  चरम पर है ऐसे में उनका मजाक क्‍या उड़ाना। इस पूरे मामले में हास्‍यास्‍पद तो ये था कि जिन बेचारे दो पत्रकारों के कंधो पर आने वाले पत्रकारों को संभालने की जिम्‍मेदारी दी गई थी वे बेचारे लाचार नजर आ रहे थे। वे तब क्‍या करें जब उनका ही कई कई साल सीनियर जिनसे उन्‍होंने मीडिया की बारीकियां सीखीं है वे सीना चौड़ा किए हुए सामाने आएं और कहे क्‍यों तुम मुझे भी कतार में ही खड़ा करोगे। मैंने तो तुम्‍हें लिखना पढना सिखाया था, सब भूल गए। बेचारा बच्‍चा पहले उन सीनियर का पैर छूता फिर उन्‍हें टोकन थमा कर नजरें चुराता नजर आता। करता भी क्‍या बेचारा, उसके हाथ में तो कुछ था ही नहीं, टोकन और लाइन में लगाने के अलावा। बहरहाल, मीडिया की हालत दिन ब दिन बिगड़ रही है खासकर हम हिंदी मीडिया की। बड़े मीडिया हाउस वाले अपने लोगों को ही एंट़्री देते हैं अपने संसथानों में बेचारे वे कहां जाएं जिनका कोई गॉड फादर नहीं है इस दुनिया में। उसपर यहां के हालत, हर हफते कुकुरमुत्‍ते की तरह चैनल, अखबार और पत्रिकाएं निकलती हैं और बरसात की मेंढक की तरह बारिश खत्‍म होते ही गुम हो जाती हैं। फंस जाते हैं पत्रकार जो बरसाती खेल में कहीं के नहीं रहते न घर के न घाट के। ऐसे में जब इंटरव्‍यू वॉक इन हो और उसमें कैटगरी टैलेंट पर नहीं माध्‍यम के आधार पर बांट दी जाए तो बेरोजगार पत्रकारों का मालिक फिर भगवान ही है। अगर सचमुच भगवान है तो। 

Wednesday, 17 December 2014

फिर काली न हो 16 दिसंबर

फिर काली न हो 16 दिसंबर
16 दिसंबर भारत और पाकिस्‍तान दोनों के लिए भारी है। कल जब पाकिस्‍तान 16 दिसंबर पर मातम पसर रहा था तभी देश की राजधानी दिल्‍ली दामिनी की दूसरी बरसी मना रहा था और बच्चियों की हिफाजत की कसमें खा रहा था
पूजा मेहरोत्रा
फिर मां रो रही है बाप बिलख रहा है और घर-घर में मातम है। आज पाकिस्‍तान के पेशावर का हर घर का आंगन नौ निहालों के शोक में बिलख रहा है। पूरा विश्‍व आज इस शोक की घड़ी में पाकिस्‍तान के साथ है और एक नजर आ रहा है। शायद ही कोई होगा जो दुखी नहीं होगा। आंति‍कयों का घिनौना चेहरा एक बार फिर इंसानियत को शर्मशार कर गया है। 16 दिसंबर की सुबह जिस तरह से पेशावर पाकिस्‍तान के आर्मी स्‍कूल में आतंकियों ने अपनी बरबरता दिखाई है उससे पूरा विश्‍व शर्मशार है। जिस तरह से पाकिस्‍तान में स्‍कूली बच्‍चों पर इन दहशतगर्दियों ने मौत बरसाई है उसने हमें एक बार फिर सोचने को मजबूर कर दिया है। कोई इतना बेरहम कैसे हो सकता है? क्‍या सचमुच उनके सीने में दिल नहीं धड़कता है? मासूमों को बिलखते देख हाथ क्‍यों नहीं कांपा उनका? कैसे वे मासूमों पर गोलियां चला रहे थे क्‍या कभी उन्‍हें किसी से मुहब्‍बत नहीं हुई मां-बाप, भाई, बेटा-बेटी, संगी-साथी कोई तो प्‍यारा होगा उनका भी? जब वे गोलियां चला रहे थे तो मासूमों की चीख पुकार से क्‍या सचमुच किसी का दिल नहीं पिघल रहा था।  क्‍या वे जिन्‍होंने ये मौत बच्‍चों के लिए भेजी थी वे चैन से सो पा रहे हैं? कैसा डर चाहते हैं वे हमारे जीवन में और क्‍या उन्‍हें सचमुच लगता है कि हम डर गए हैं। नहीं दहशतगर्दों गोलियों से कोई नहीं डरता आजमा कर देख लो कई मासूम खुद तुम्‍हारे आगे आ जाएंगे । एक बार फिर शहीद होने के लिए तैयार हो जाएगी कतारें लेकिन उन बर्बर जानवरों से भी बत्‍तर हो अब समय आ गया है कि तुम्‍हें नेस्‍तनाबूद कर दें। ऐसा नहीं है कि सिर्फ आज वे मांए ही रो रहीं हैं जिनकी उन आंतकियों ने गोद उजाड़ दी है बल्कि वे मांए भी आज अपनी कोख को कोस रही हैं जिनकी कोख से तुम जैसे हैवानों ने जन्‍म लिया है।
 कश्‍मीर पर चर्चा हम फिर कभी कर लेंगे अभी बात सिर्फ दहशतगर्दों की। पाकिस्‍तान में शरण‍ लिए हुए आतंकी कभी मुंबई में, कभी कश्‍मीर में, कभी हैदराबाद में तो कभी दिल्‍ली में दहशत फैलाते रहे हैं जिसे पाकिस्‍तान संरक्षण देता रहा है। भारतीयों से बेहतर इस दुख को कौन समझ सकता है शायद यही वजह है कि पूरा भारत पाकिस्‍तान की इस दुख की घड़ी में दुखी है। लेकिन अब एक सलाह है पाकिस्‍तान से अब वह जागे और अपनी जमीन पर जिन दहशतगर्दों को पनाह दे रखी है उन गुनहगारों को उन मुल्‍कों को सौंप दें जिनके वे गुनहगार हैं। अब पाकिस्‍तान को यह भी समझना होगा कि उन गुनहगारों की नजरें देश के भविष्‍य पर और फरिस्‍तो पर है। हर देश का भविष्‍य उसके नौनिहाल होते हैं मंगलवार को जिस तरह से आतंकियों ने मासूमों पर ताबरतोड़ गोलियों बरसाई हैं उसे देखने के बाद अब समय आ गया है कि आतंकियों को देखते ही या तो गोली मार दिया जाए या फिर पता चलते ही फांसी पर लटकाया जाए। ओसामा बिन लादेन, हाफिज सईद और दाउद इब्राहिम जैसे आतंकवादियों को पनाह देने से बचें क्‍योंकि यही चेहरे रूप बदलकर आपको आतंकित कर रहे हैं। ये वही बबूल का पेड़ हैं जिनसे आप आम निकलने की उम्‍मीदें लगाए बैठे थे लेकिन आप भूल गए कि बोया पेड बबूल का तो आम कहां से पाए।
 16 दिसंबर को तहरीक ए तालिबान पाकिस्‍तान ने 132 मासूमों को मौत के घाट उतारा है जिस तरह से उन्‍होंने सिर झुकाए हुए कांपते थरथर्राते बच्‍चों पर गोलियां बरसाई है, उनकी शिक्षक को उनके सामने जलाया है, बच्‍चों के गले रेत डाले हैं यह कोई इंसान के शरीर में बैठा हैवान या उससे भी कोई खराब शब्‍द हो तो वही वहशी कर सकता है। क्‍या बीत रही है उन मासूमों के दिल पल जिन्‍होंने वहशी हरकत को अपने सामने अंजाम होते देखा है। क्‍या वे काली सुबह को कभी अपनी जिंदगी से मिटा पाएंगे। ये बच्‍चे कभी अपने दोस्‍तों को भूल पाएंगे। क्‍या मासूमों की आंखों से ये मंजर, उनकी जेहन से ये मंजर कभी मिट पाएगा। क्‍या प्रभाव डालेगा ये मंजर उनके जेहन पर और जीवन पर। काश सभी इस मंजर से सीख लें और सौंगध खाएं कि वे इस आतंकवाद का विरोध करेंगे और मलाला की तरह वह भी एक मिशाल कायम करेंगे ।

 कई खबरिया चैनलों में अखबारों में तहरीके तालिबान पाकिसतान के प्रवक्‍ता मोहम्‍मद खारासानी की बातें छापी हैं जिसमें उसने कहा है कि सिर्फ बड़े बच्‍चों को निशाना बनाने के लिए दहशतगर्दों को कहा गया था।  क्‍या वे ये बताएंगे कि बच्‍चों को टार्गेट किया ही क्‍यूं गया था । अगर उन्‍हें पाकिस्‍तानी आर्मी में दहशत फैलानी थी या बदला लेना था तो उनके किसी बैरक पर हमला बोल देते, बच्‍चों को निशाना क्‍यों बनाया। यह कैसा बदला है उनका।  आज हर किसी का मन बार बार एक ही सवाल कर रहा है कि बच्‍चे ही क्‍यों। लेकिन क्‍या सचमुच पाकिस्‍तान के हुक्‍मरानों को समझ आया है या आज इस वक्‍त में भी वे राजनीति कर रहे हैं। आरोपों की राजनीति। अब पाकिसतान को समझना होगा कि राजनीति से अलग उनकी जिम्‍मेदारी देश है देश की तरक्‍की और देश की रक्षा भी है समय है कि वे दहशतगर्दों के खिलाफ कड़े कदम उठाएं। हर किसी के लिए एक सा कानून बनाएं। इस बात को भी समझें कि यदि दाऊद,ओसामा और हाफिज अगर भारत और विश्‍व के आतंकी चेहरा हैं वह उनके देश के लिए फरिश्‍ते नहीं बन सकते क्‍योंकि हैवानियत का कोई चेहरा नहीं होता। हैवान सिर्फ हैवान होता है। लेकिन इन सबके बीच एक बात जो आपको गर्वान्वित कर रही है वह है आपका भारतीय होना। जिस तरह से भारत सरकार, भारतीय मीडिया और सोशल मीडिया ने पाकिस्‍तान के दुख में दुख दिखाया है और विरोध दर्ज कराया है इसे देख कर ऐसा लगता है जैसे हमला हमारे दिल पर कर दिया गया है। जिस तरह हमने पाकिस्‍तान के दर्द को अपना दर्द समझा है। लेकिन अब समय आ गया है कि पाकिस्‍तान अब समझ जाए कि दूसरों के दर्द को बढ़ाने की कोशिश में उसका दर्द बढ़ रहा है। पाकिस्‍तान को आतंक के खिलाफ कड़ा फैसला लेना होगा। राजनीति से अलग रखकर इसे देश का कलंक मानकर सभी राजनीतिक पार्टियों को एकजुट होना होगा। कश्‍मीर पर फिर बात हो जाएगी शरीफ साहेब पहले देश के नौनहालो और अपने मसलों को संभालो। फिर 16 दिसंबर इतनी काली न हो।  

Friday, 12 December 2014

बिखरी ज़िंदगी समेट आगे बहुत आगे निकल गईं हैं ये “शीरोज”

बिखरी ज़िंदगी समेट आगे बहुत आगे निकल गईं हैं ये “शीरोज”
 तेज़ाब पीड़ित कई लड़कियां आज की “शिरोज” हैं। उन्होने घर की चारदीवारी लांघ दी है, घर से निकलने से पहले चेहरे को नकाब से ढकना छोड़ दिया है। तेज़ाब से पूरी तरह बह चुकी आँखों पर अब काला चश्मा भी नहीं लगाती हैं और शान से कहती हैं  ‘हमे अपने इस चेहरे से प्यार है, क्यूँ छुपाएँ हम चेहरे को जब हमारी कोई गलती ही नहीं है।“ क्यूँ छुपे हम जमाने से?
पूजा मेहरोत्रा

जब शरीर पर गरम पानी की चंद बूंदे या गरम तेल के छींटे पड़ती हैं तो कुछ देर के लिए जलन हमे तिलमिला देती है और उस बूंद से शरीर पर पड़े छाले हमे डराते रहते हैं । हम उस दर्द को अहसास भी नहीं कर सकते जिनपर तेजाबी हमला होता है। तेज़ाब सिर्फ हमले के शिकार के जिस्म को नहीं झुलसाता  बल्कि पीड़ित की पूरी ज़िंदगी झुलस जाती है। झुलसे शरीर का दर्द कैसा होगा उसका अंदाज़ लगाना भी पूरे शरीर मे झुरझुरी पैदा कर देता है। तेज़ाब जैसे ही शरीर पर पड़ता है स्किन ऐसे पिघलती है जैसे पोलीथिन सिकुड़ती है या टायर जलता है। बूंद बूंद कर त्वचा गल कर निकल जाती है। आंखे तक बह जाती हैं। अगर तेज़ाब पीड़ित अपने चेहरे को नकाब से और आंखो को काले चश्मे से ढँक कर न चलें तो यकीन मानिए उन्हे देखने के लिए खास तरह कि हिम्मत की जरूरत पड़ती है। उस दर्द को महसूस भी नहीं किया जा सकता जिससे वे पीड़ित होती हैं। एक तरफा प्रेम मे पागल ने इसलिए एसिड फेंक दिया क्यूकी वो उसकी “न” सह नहीं पाया। भूख से बिलबिलाती बच्ची को देख माँ पति से कहती है दूध ला दो और बाप शराब पीकर आता है, बेटियों और पत्नी के लिए तेजाब लाता है ...उस नन्ही जान का क्या की उसकी माँ उसे जन्म देते ही चल बसी बाप सौतेली माँ लाया जो माँ न बन सकी सोई हुई बेटी पर तेज़ाब उड़ेल दिया। उस बहन का क्या जिसपर भाई को गर्व करना था कई कई बार बहन ने अपनी रक्षा के लिए उस भाई को राखी बंधी थी भाई ने उसे ही तेज़ाब मे डुबा दिया । लेकिन एक सवाल फिर से इस समाज से आखिर इन बच्चियों का कसूर क्या है ? कब तक तेज़ाब हथियार की तरह महिलाओं पर उपयोग किया जाता रहेगा? कानून भी इन बच्चियों कि मदद मे कमजोर नज़र आता है। हमला करने वाला बड़ी शान से अपनी ज़िंदगी मे खुश होता है और बछियाँ जिंदा लाश कि तरह पूरा जीवेन व्यतीत करने पर मजबूर होती हैं। समाज भी उन्हे ही दोषी मानता है। ताने भी उन्हे ही सहने पड़ते हैं। लंबी लड़ाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने तेजाब बिक्री पर पाबंदी लगाई लेकिन आज भी सरेराह तेजाब बिक्री हो रही है। हमला पीड़ित को तत्काल प्रभाव से सरकार को तीन लाख रूपय देने का आदेश है लेकिन कितनों को मिल पा रहा  है सरकार का समर्थन?  

विज्ञापन की औरत क्या कहती है




ये तेजाब पीडि़त नहीं तेजस्वी् लड़कियां हैं


कभी डॉक्टर वकील थे अब भिखारी हैं



जिसकी जिंदगी रुक गई उसके लिए 15 मिनट